The Essence of the Tantra· 11.22 / 25

The Essence of the Tantra11.22

11.22

ननु सो ऽपि अब्रुवन् विपरीतं वा ब्रुवन् किं न त्याज्यः नैव इति ब्रूमः तस्य हि पूर्णज्ञानत्वात् एव रागाद्यभाव इति अवचनादिकं शिष्यगतेनैव केनचित् अयोग्यत्वानाश्वस्तत्वादिना निमित्तेन स्यात् इति तदुपासने यतनीयं शिष्येण न तत्त्यागे

Transliteration (IAST)

nanu so 'pi abruvan viparītaṃ vā bruvan kiṃ na tyājyaḥ naiva iti brūmaḥ tasya hi pūrṇajñānatvāt eva rāgādyabhāva iti avacanādikaṃ śiṣyagatenaiva kenacit ayogyatvānāśvastatvādinā nimittena syāt iti tadupāsane yatanīyaṃ śiṣyeṇa na tattyāge

— ननु — किन्तु (आक्षेप) ; — न बोलते हुए (न पढ़ाते हुए) ; — विपरीत बोलते हुए (गलत पढ़ाते हुए) ; — त्याज्य — त्यागने योग्य ; — पूर्ण-ज्ञानत्व के कारण ; — राग आदि का अभाव ; — शिष्य में ही स्थित ; — अयोग्यता, अनाश्वस्तता आदि (निमित्त से) ; — निमित्त (कारण) से ; — उसकी उपासना में यत्न करना चाहिए

(शंका) किन्तु वह भी न बोलते हुए, अथवा विपरीत बोलते हुए, क्या त्याज्य नहीं? (उत्तर) नहीं ही — ऐसा हम कहते हैं। क्योंकि उसके पूर्ण-ज्ञानत्व से ही राग आदि का अभाव है; अतः अवचन (न बोलना) आदि शिष्य में ही स्थित किसी अयोग्यता, अनाश्वस्तता आदि निमित्त से होगा। अतः शिष्य को उसकी उपासना में यत्न करना चाहिए, उसके त्याग में नहीं।