The Essence of the Tantra· 11.21 / 25

The Essence of the Tantra11.21

11.21

उत्तमोत्तमादिज्ञानभेदापेक्षया तेषु वर्तेत सम्पूर्णज्ञानगुरुत्यागे तु प्रायश्चित्तम् एव

Transliteration (IAST)

uttamottamādijñānabhedāpekṣayā teṣu varteta sampūrṇajñānagurutyāge tu prāyaścittam eva

— उत्तम-उत्तम आदि ज्ञान-भेद की अपेक्षा से ; — उनमें (गुरुओं में) वर्तना (व्यवहार करना) चाहिए ; — सम्पूर्ण-ज्ञान गुरु के त्याग में ; — प्रायश्चित्त ही (होता है)

उत्तम-उत्तम आदि ज्ञान-भेद की अपेक्षा से उनमें (गुरुओं में) वर्तना (व्यवहार करना) चाहिए। किन्तु सम्पूर्ण-ज्ञान गुरु के त्याग में तो प्रायश्चित्त ही (होता है)।