The Essence of the Tantra· 11.20 / 25

The Essence of the Tantra11.20

11.20

योगी तु फलोत्सुकस्य युक्तो यदि उपायोपदेशेन अव्यवहितम् एव फलं दातुं शक्तः उपायोपदेशेन तु ज्ञाने एव युक्तो मोक्षे ऽपि अभ्युपायात् ज्ञानपूर्णताकाङ्क्षी च बहून् अपि गुरून् कुर्यात्

Transliteration (IAST)

yogī tu phalotsukasya yukto yadi upāyopadeśena avyavahitam eva phalaṃ dātuṃ śaktaḥ upāyopadeśena tu jñāne eva yukto mokṣe 'pi abhyupāyāt jñānapūrṇatākāṅkṣī ca bahūn api gurūn kuryāt

— योगी ; — फल-उत्सुक के लिए ; — युक्त — समर्थ ; — उपाय-उपदेश से ; — अव्यवहित (तत्काल) फल ; — देने में शक्त ; — ज्ञान में ही युक्त ; — (ज्ञान) उपाय होने के कारण ; — ज्ञान-पूर्णता का आकाङ्क्षी ; — अनेक गुरुओं को कर सकता है

किन्तु योगी फल-उत्सुक के लिए युक्त (समर्थ) है, यदि वह उपाय-उपदेश से अव्यवहित (तत्काल) फल देने में शक्त हो; किन्तु उपाय-उपदेश से वह ज्ञान में ही युक्त है, मोक्ष में भी (युक्त है) क्योंकि (ज्ञान) उपाय है। और ज्ञान-पूर्णता का आकाङ्क्षी अनेक गुरुओं को भी कर सकता है।