The Essence of the Tantra· 11.15 / 25

The Essence of the Tantra11.15

11.15

मध्यस् तु त्रिधा भोगोत्सुकता यदा प्रधानभूता तदा मन्दत्वं पारमेश्वरमन्त्रयोगोपायतया यतस् तत्र औत्सुक्यम् पारमेशमन्त्रयोगादेश् च यतो मोक्षपर्यन्तत्वम् अतः शक्तिपातरूपता

Transliteration (IAST)

madhyas tu tridhā bhogotsukatā yadā pradhānabhūtā tadā mandatvaṃ pārameśvaramantrayogopāyatayā yatas tatra autsukyam pārameśamantrayogādeś ca yato mokṣaparyantatvam ataḥ śaktipātarūpatā

— मध्य (शक्तिपात) तीन प्रकार का ; — भोग-उत्सुकता ; — प्रधानभूत — प्रमुख बन जाना ; — मन्दता — मन्द स्वभाव ; — पारमेश्वर मन्त्र-योग के उपाय रूप से ; — औत्सुक्य — उत्सुकता ; — मोक्ष-पर्यन्तत्व (मोक्ष में परिणति) ; — शक्तिपात-रूपता

किन्तु मध्य (शक्तिपात) तीन प्रकार का है। जब भोग-उत्सुकता प्रधानभूत होती है, तब मन्दता (होती है), पारमेश्वर मन्त्र-योग के उपाय रूप से — क्योंकि वहाँ उत्सुकता (रहती है); और पारमेश मन्त्र-योग आदि का मोक्ष-पर्यन्तत्व होने के कारण शक्तिपात-रूपता (है)।