The Essence of the Tantra· 10.14 / 18

The Essence of the Tantra10.14

10.14

करणतोपसर्जनकर्तृभावस्फुटत्वात् पञ्च शुद्धकर्तृभावात् पञ्च विगलितविभागतया विकासोन्मुखत्वे पञ्च सर्वावच्छेदशून्यं शिवतत्त्वं षट्त्रिंशम्

Transliteration (IAST)

karaṇatopasarjanakartṛbhāvasphuṭatvāt pañca śuddhakartṛbhāvāt pañca vigalitavibhāgatayā vikāsonmukhatve pañca sarvāvacchedaśūnyaṃ śivatattvaṃ ṣaṭtriṃśam

— करणता-उपसर्जन (गौण) कर्तृ-भाव के स्फुट होने के कारण ; — पाँच ; — शुद्ध कर्तृ-भाव से ; — विगलित-विभाग रूप से (विभाग के गल जाने से) ; — विकास-उन्मुख होने पर ; — समस्त अवच्छेद से शून्य ; — शिव-तत्त्व, छत्तीसवाँ

करणता-उपसर्जन (गौण) कर्तृ-भाव के स्फुट होने से पाँच; शुद्ध कर्तृ-भाव से पाँच; विगलित-विभाग रूप से विकास-उन्मुख होने पर पाँच; और समस्त अवच्छेद से शून्य शिव-तत्त्व छत्तीसवाँ।