The Essence of the Tantra· 1.3 / 5

The Essence of the Tantra1.3

1.3

श्रीशम्भुनाथभास्करचरणनिपातप्रभापगतसङ्कोचम् । अभिनवगुप्तहृदम्बुजम् एतद् विचिनुत महेशपूजनहेतोः

Transliteration (IAST)

śrīśambhunāthabhāskaracaraṇanipātaprabhāpagatasaṅkocam | abhinavaguptahṛdambujam etad vicinuta maheśapūjanahetoḥ

— श्री शम्भुनाथ-रूपी सूर्य (अभिनवगुप्त के गुरु) ; — चरणों का निपात (पाद-प्रहार, अवतरण) ; — जिसका संकोच प्रभा से दूर हो गया ; — अभिनवगुप्त के हृदय का कमल ; — यह ; — चुनो, ग्रहण करो, (मधु) खोज लो ; — महेश्वर की पूजा के निमित्त

श्री शम्भुनाथ-रूपी सूर्य के चरणों के निपात (पादप्रहार) की प्रभा से जिसका संकोच दूर हो गया है, अभिनवगुप्त के हृदय-कमल में से इस (मधु) को महेश्वर की पूजा के निमित्त चुन लो (ग्रहण करो)।