Stanzas on the Divine Pulsation · 3.15

Stanzas on the Divine Pulsation 3.15

3.15
स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥१५॥
svarūpāvaraṇe cāsya śaktayaḥ satatotthitāḥ | yataḥ śabdānuvedhena na vinā pratyayodbhavaḥ ||
anuṣṭubh
— स्वरूप के आवरण (आच्छादन) में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — और (अव्यय) ; — उस (शिव या पशु) का — पु.षष्ठी एक. ; — शक्तियाँ (कर्ता कारक बहुवचन, स्त्रीलिङ्ग) ; — सतत-उत्थित — निरन्तर उठती हुई (कर्ता कारक बहुवचन — समासगत) ; — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — शब्द के अनुवेध (वेधन) से (करण कारक — समासगत) ; — नहीं (अव्यय, निषेधार्थक) ; — बिना, रहित (अव्यय) ; — प्रत्यय का उद्भव — विचार का उठना (कर्ता कारक — समासगत)

उसके स्वरूप के आवरण (आच्छादन) में ये शक्तियाँ निरन्तर उठती रहती हैं; क्योंकि शब्द के अनुवेध (वेधन) के बिना प्रत्यय (विचार) का उद्भव नहीं होता।