परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥१४॥
parāmṛta-rasāpāyas tasya yaḥ pratyayodbhavaḥ |
tenāsvatantratām eti sa ca tan-mātra-gocaraḥ ||
anuṣṭubh
— परा-अमृत के रस का अपगम (हानि) — कर्ता कारक — समासगत; — उस (पशु) का — पु.षष्ठी एक.; — जो — पु.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक सर्वनाम; — प्रत्यय का उद्भव — मानसिक संकल्प का उठना (कर्ता कारक — समासगत); — उसके (प्रत्ययोद्भव के) द्वारा — पु.करण एक.; — अस्वतन्त्रता को — परतन्त्रता को (कर्म कारक, स्त्रीलिङ्ग); — प्राप्त करता है (वर्त. तृ.पु.एक. √इ); — वह — पु.कर्ता एक. सर्वनाम; — और (अव्यय); — तन्मात्र-गोचर — केवल सूक्ष्म तत्त्वों का क्षेत्र (कर्ता कारक — समासगत)
उसके लिए परा-अमृत के रस का अपगम (हानि) ही प्रत्यय (मानसिक संकल्प) का उद्भव है; उसी के द्वारा वह अस्वतन्त्रता को प्राप्त होता है, और उसका (विषय-)क्षेत्र तन्मात्र-गोचर (केवल सूक्ष्म तत्त्व) तक सीमित रहता है।