The Vision of Śiva· 6.31 / 126

The Vision of Śiva6.31

6.31
अव्याप्तिरन्तःकृत्यादेर्भवेत्षड्धामवादिनाम् । तत्र चित्पक्षपातश्चेत् प्राप्नुयात् सततं ग्रहः ॥३१॥
avyāptirantaḥkṛtyāderbhavetṣaḍdhāmavādinām | tatra citpakṣapātaścet prāpnuyāt satataṃ grahaḥ
— अव्याप्ति (कमी) ; — अन्तःकरण-कृत्य आदि की ; — होगी ; — षड्धाम-वादियों के ; — वहाँ ; — चित् के प्रति पक्षपात ; — यदि ; — प्राप्त होगा ; — सतत ; — ग्रह (ज्ञान)

षड्धाम-वादियों (छह आश्रयों के वादियों) के (मत में) अन्तःकरण-कृत्य आदि की अव्याप्ति (कमी) हो जाएगी; और यदि वहाँ चित् के प्रति पक्षपात (चित् को मूल मानना) हो, तो सतत ग्रह (सबका निरन्तर ज्ञान) प्राप्त हो जाएगा (जिसे वे नहीं मानते)।