अव्याप्तिरन्तःकृत्यादेर्भवेत्षड्धामवादिनाम् ।
तत्र चित्पक्षपातश्चेत् प्राप्नुयात् सततं ग्रहः ॥३१॥
avyāptirantaḥkṛtyāderbhavetṣaḍdhāmavādinām |
tatra citpakṣapātaścet prāpnuyāt satataṃ grahaḥ
षड्धाम-वादियों (छह आश्रयों के वादियों) के (मत में) अन्तःकरण-कृत्य आदि की अव्याप्ति (कमी) हो जाएगी; और यदि वहाँ चित् के प्रति पक्षपात (चित् को मूल मानना) हो, तो सतत ग्रह (सबका निरन्तर ज्ञान) प्राप्त हो जाएगा (जिसे वे नहीं मानते)।