जानन्नवस्थितो दूरे स्वर्गादौ निरयेऽथवा ।
प्रत्यक्षादिप्रक्रियायास्तथा शिवकृतस्थितेः ॥७८॥
jānannavasthito dūre svargādau niraye'thavā |
pratyakṣādiprakriyāyāstathā śivakṛtasthiteḥ
(अपने आत्मा को) जानता हुआ (वह) दूर — स्वर्ग आदि में, अथवा नरक में — (वैसा ही) अवस्थित रहता है; और इसी प्रकार प्रत्यक्ष आदि की प्रक्रिया की स्थिति शिव द्वारा कृत (की हुई) है (— एक ज्ञाता सब में)।