The Vision of Śiva· 5.78 / 110

The Vision of Śiva5.78

5.78
जानन्नवस्थितो दूरे स्वर्गादौ निरयेऽथवा । प्रत्यक्षादिप्रक्रियायास्तथा शिवकृतस्थितेः ॥७८॥
jānannavasthito dūre svargādau niraye'thavā | pratyakṣādiprakriyāyāstathā śivakṛtasthiteḥ
— जानता हुआ ; — अवस्थित ; — दूर ; — स्वर्ग आदि में ; — नरक में ; — अथवा ; — प्रत्यक्ष आदि की प्रक्रिया की ; — उसी प्रकार ; — जिसकी स्थिति शिव द्वारा कृत

(अपने आत्मा को) जानता हुआ (वह) दूर — स्वर्ग आदि में, अथवा नरक में — (वैसा ही) अवस्थित रहता है; और इसी प्रकार प्रत्यक्ष आदि की प्रक्रिया की स्थिति शिव द्वारा कृत (की हुई) है (— एक ज्ञाता सब में)।