व्यापकत्वाच्छिवत्वस्य सर्वज्ञत्वाद्भवेदथ ।
तस्मादेतच्च संज्ञेयं सर्वः स्वात्मानमात्मना ॥७७॥
vyāpakatvācchivatvasya sarvajñatvādbhavedatha |
tasmādetacca saṃjñeyaṃ sarvaḥ svātmānamātmanā
शिवत्व के व्यापकत्व के कारण, और (उसके) सर्वज्ञत्व के कारण, (यह सब) होगा; इसलिए यह भी संज्ञेय (जानने योग्य) है कि सब (वस्तु) अपने ही आत्मा को अपने (आत्मा) से (जानती है)।