सर्वज्ञत्वे न किं सर्वे सर्वज्ञाः स्युः शरीरिणः ।
सर्व एव हि सर्वज्ञा मनःसंकल्पनावशात् ॥१०१॥
sarvajñatve na kiṃ sarve sarvajñāḥ syuḥ śarīriṇaḥ |
sarva eva hi sarvajñā manaḥsaṃkalpanāvaśāt
यदि (ऐसा अन्तर्निहित) सर्वज्ञत्व हो, तो समस्त शरीरी (देहधारी) सर्वज्ञ क्यों न हों? सब ही निश्चय ही सर्वज्ञ हैं — मन के संकल्पन (स्वतन्त्र कल्पना) के वश से।