The Vision of Śiva· 5.101 / 110

The Vision of Śiva5.101

5.101
सर्वज्ञत्वे न किं सर्वे सर्वज्ञाः स्युः शरीरिणः । सर्व एव हि सर्वज्ञा मनःसंकल्पनावशात् ॥१०१॥
sarvajñatve na kiṃ sarve sarvajñāḥ syuḥ śarīriṇaḥ | sarva eva hi sarvajñā manaḥsaṃkalpanāvaśāt
— सर्वज्ञत्व होने पर ; — क्यों न ; — सब ; — सर्वज्ञ ; — हों ; — शरीरी (देहधारी) ; — सब ही निश्चय ; — सर्वज्ञ ; — मन के संकल्पन के वश से

यदि (ऐसा अन्तर्निहित) सर्वज्ञत्व हो, तो समस्त शरीरी (देहधारी) सर्वज्ञ क्यों न हों? सब ही निश्चय ही सर्वज्ञ हैं — मन के संकल्पन (स्वतन्त्र कल्पना) के वश से।