सहानवस्थितिर्नास्ति विरोधः प्राग्विनाशतः ।
अन्योन्यपरिहारो वा ज्ञानाज्ञानात्मकः स्थितः ॥२४॥
sahānavasthitirnāsti virodhaḥ prāgvināśataḥ |
anyonyaparihāro vā jñānājñānātmakaḥ sthitaḥ
सह-अनवस्थिति (साथ न रह सकना) रूप विरोध नहीं है, क्योंकि (पूर्व ज्ञान) पहले ही नष्ट हो चुका; अथवा अन्योन्य-परिहार (परस्पर बहिष्कार) ज्ञान और अज्ञान के बीच ही स्थित है (न कि दो भिन्न-काल के ज्ञानों में)।