The Vision of Śiva· 4.24 / 124

The Vision of Śiva4.24

4.24
सहानवस्थितिर्नास्ति विरोधः प्राग्विनाशतः । अन्योन्यपरिहारो वा ज्ञानाज्ञानात्मकः स्थितः ॥२४॥
sahānavasthitirnāsti virodhaḥ prāgvināśataḥ | anyonyaparihāro vā jñānājñānātmakaḥ sthitaḥ
— सह-अनवस्थिति ; — नहीं है ; — विरोध ; — पहले ही नष्ट होने से ; — अन्योन्य-परिहार (परस्पर बहिष्कार) ; — अथवा ; — ज्ञान-अज्ञान-रूप ; — स्थित

सह-अनवस्थिति (साथ न रह सकना) रूप विरोध नहीं है, क्योंकि (पूर्व ज्ञान) पहले ही नष्ट हो चुका; अथवा अन्योन्य-परिहार (परस्पर बहिष्कार) ज्ञान और अज्ञान के बीच ही स्थित है (न कि दो भिन्न-काल के ज्ञानों में)।