The Vision of Śiva· 1.12 / 49

The Vision of Śiva1.12

1.12
रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् । पञ्चप्रकारकृत्योक्तिशिवत्वान्निजकर्मणे ॥१२॥
rūpaprasārarasato garhitatvamayuktimat | pañcaprakārakṛtyoktiśivatvānnijakarmaṇe
— अपने स्वरूप के प्रसार के रस से ; — निन्दनीयता, गर्हितत्व ; — युक्तिसंगत नहीं ; — पाँच प्रकार के कृत्य का करना ही शिवत्व है, इसलिए ; — अपने निज कर्म के लिए

— (उत्तर:) अपने स्वरूप के प्रसार के रस से (उद्भूत होने के कारण) निन्दनीयता का आरोप युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि पाँच प्रकार के कृत्य का करना ही शिवत्व है, और यही उसका निज कर्म है।