Verses on the Recognition of the Lord· 6.5 / 11

Verses on the Recognition of the Lord6.5

6.5
प्रमातृत्वेनाहम् इति विमर्शो ऽन्यव्यपोहनात् विकल्प एव स परप्रतियोग्य् अवभासजः ॥५॥
pramātṛtvenāham iti vimarśo 'nyavyapohanāt vikalpa eva sa parapratiyogy avabhāsajaḥ
— (सीमित) प्रमातृत्व रूप में ; — 'मैं' ; — इति — इस प्रकार ; — विमर्श ; — अन्य के व्यपोहन (बहिष्कार) के कारण ; — विकल्प ही ; — वह (विमर्श) ; — जिसका प्रतियोगी वह अन्य है ; — आभास से उत्पन्न

— वह 'मैं (सीमित) प्रमाता हूँ' इस रूप का विमर्श, अन्य के व्यपोहन (बहिष्कार) के कारण, विकल्प ही है, जिसका प्रतियोगी वह अन्य है और जो आभास से उत्पन्न होता है।