Verses on the Recognition of the Lord· 6.1 / 11

Verses on the Recognition of the Lord6.1

6.1
अहंप्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मापि वाग्वपुः नासौ विकल्पः स ह्य् उक्तो द्वयाक्षेपी विनिश्चयः ॥१॥
ahaṃpratyavamarśo yaḥ prakāśātmāpi vāgvapuḥ nāsau vikalpaḥ sa hy ukto dvayākṣepī viniścayaḥ
— 'अहम्' का प्रत्यवमर्श (आत्म-विमर्श) ; — जो ; — प्रकाश-स्वरूप ; — यद्यपि, होते हुए भी ; — वाक्-स्वरूप, जिसका शरीर वाणी है ; — नहीं ; — वह (अहं-विमर्श) ; — विकल्प ; — वह (विकल्प) ; — क्योंकि, निश्चय ही ; — कहा गया है (भूत कृदन्त) ; — द्वैत का आक्षेप करने वाला ; — विनिश्चय — निश्चयात्मक ज्ञान

'अहम्' का जो प्रत्यवमर्श है, जो प्रकाश-स्वरूप होते हुए भी वाक्-स्वरूप है — वह विकल्प नहीं है; क्योंकि विकल्प तो वह कहा गया है जो द्वैत का आक्षेप करने वाला निश्चय हो।