Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.31 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.31

9.31
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ९-३१ ॥
api cet sudurācāro bhajate māmananyabhāk | sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ || 9-31 ||
— यदि अत्यन्त दुराचारी भी ; — अनन्य भाव से मुझे भजता है ; — उसे साधु ही मानना चाहिए ; — क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय किया है

यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय किया है।