अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
९-३१ ॥
api cet sudurācāro bhajate māmananyabhāk |
sādhureva sa mantavyaḥ samyagvyavasito hi saḥ ||
9-31 ||
यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय किया है।