Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.30 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.30

9.30
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाऽप्यहम् ॥ ९-३० ॥
samo'haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cā'pyaham || 9-30 ||
— मैं समस्त भूतों में समान ; — न मेरा द्वेष्य है, न प्रिय ; — किन्तु जो भक्ति से मुझे भजते हैं ; — वे मुझमें और मैं उनमें

मैं समस्त भूतों में समान हूँ; न मेरा कोई द्वेष्य है, न प्रिय; किन्तु जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।