Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.32 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.32

9.32
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मद्भक्तः प्रणश्यति ॥ ९-३२ ॥
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati | kaunteya pratijānīhi na madbhaktaḥ praṇaśyati || 9-32 ||
— शीघ्र वह धर्मात्मा हो जाता है ; — स्थायी शान्ति को प्राप्त करता है ; — हे कुन्तीपुत्र, निश्चय जान ; — मेरा भक्त नष्ट नहीं होता

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त करता है; हे कुन्तीपुत्र, निश्चय जान — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।