Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.25 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.25

9.25
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । नतु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्चलन्ति ते ॥ ९-२५ ॥
ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca | natu māmabhijānanti tattvenātaścalanti te || 9-25 ||
— क्योंकि मैं ही समस्त यज्ञों का ; — भोक्ता और प्रभु ; — किन्तु वे मुझे नहीं जानते ; — तत्त्व से; इसी से वे च्युत होते हैं

क्योंकि मैं ही समस्त यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ; किन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसी से वे (मार्ग से) च्युत हो जाते हैं।