Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.13 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.13

9.13
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । आसुरीं राक्षसीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ ९-१३ ॥
moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ | āsurīṃ rākṣasīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ || 9-13 ||
— व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्म वाले ; — व्यर्थ ज्ञान वाले, विवेकहीन ; — आसुरी और राक्षसी ; — मोहिनी प्रकृति का आश्रय लिए

व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्म वाले, व्यर्थ ज्ञान वाले विवेकहीन लोग आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का आश्रय लेते हैं।