Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.14 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.14

9.14
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ ९-१४ ॥
mahātmānastu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtimāśritāḥ | bhajantyananyamanaso jñātvā bhūtādimavyayam || 9-14 ||
— किन्तु महात्मा, हे पार्थ, मुझे ; — दैवी प्रकृति का आश्रय लिए ; — भजते हैं अनन्य मन से ; — भूतों का अव्यय आदि-कारण जानकर

किन्तु हे पार्थ, दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा मुझे भूतों का अव्यय आदि-कारण जानकर अनन्य मन से भजते हैं।