Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.10 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.10

8.10
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८-१० ॥
prayāṇakāle manasācalena bhaktyā yukto yogabalena caiva | bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam || 8-10 ||
— प्रयाणकाल में अचल मन से ; — भक्ति से युक्त और योगबल से ; — भृकुटियों के मध्य प्राण को भली-भाँति स्थापित करके ; — वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है

प्रयाणकाल में अचल मन से, भक्ति से युक्त होकर और योगबल से, प्राण को भृकुटियों के मध्य में भली-भाँति स्थापित करके — वह उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।