Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.27 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.27

7.27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ ७-२७ ॥
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata | sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa || 7-27 ||
— इच्छा-द्वेष से उत्पन्न ; — द्वन्द्व-मोह से, हे भारत ; — समस्त भूत सम्मोह को ; — जन्म के समय प्राप्त होते हैं, हे परन्तप

हे भारत, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व-मोह के कारण, हे परन्तप, समस्त भूत जन्म के समय सम्मोह को प्राप्त होते हैं।