Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.21 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.21

7.21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ ७-२१ ॥
yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati | tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyaham || 7-21 ||
— जो-जो भक्त जिस-जिस देव-रूप को ; — श्रद्धा से पूजना चाहता है ; — उसकी अचल श्रद्धा को ; — उसी को मैं स्थिर कर देता हूँ

जो-जो भक्त जिस-जिस देव-रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस की उस श्रद्धा को मैं अचल कर देता हूँ।