Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.22 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.22

7.22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान् मयैव विहितान्हितान् ॥ ७-२२ ॥
sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhate | labhate ca tataḥ kāmān mayaiva vihitānhitān || 7-22 ||
— वह उस श्रद्धा से युक्त ; — उस देवता की आराधना करता है ; — और उससे कामनाओं को पाता है ; — मेरे द्वारा ही विहित, हितकारी

वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है, और उससे अपनी कामनाओं को पाता है — जो वस्तुतः उसके हित के लिए मेरे द्वारा ही विहित (निश्चित) हैं।