Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.15 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.15

7.15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ ७-१५ ॥
na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ | māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ || 7-15 ||
— दुष्कर्मी मूढ़ मेरी शरण में नहीं ; — नराधम (आते हैं) ; — माया से अपहृत ज्ञान वाले ; — आसुर भाव का आश्रय लिए

दुष्कर्म करने वाले, मूढ़, नराधम मेरी शरण में नहीं आते; माया से जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, वे आसुर भाव का आश्रय लेते हैं।