Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.11 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.11

6.11
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ ६-११ ॥
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ | ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ || 6-11 ||
— योगी निरन्तर अपने को जोड़े ; — एकान्त में स्थित होकर ; — अकेला, मन-आत्मा को संयत किए ; — आशारहित, परिग्रहरहित

योगी एकान्त में स्थित होकर, अकेला, मन और आत्मा को संयत किए हुए, आशारहित और परिग्रहरहित होकर निरन्तर अपने को (योग में) जोड़े।