योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
६-११ ॥
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ |
ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ ||
6-11 ||
योगी एकान्त में स्थित होकर, अकेला, मन और आत्मा को संयत किए हुए, आशारहित और परिग्रहरहित होकर निरन्तर अपने को (योग में) जोड़े।