Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.7 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.7

5.7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ५-७ ॥
yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ | sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate || 5-7 ||
— योगयुक्त, विशुद्ध आत्मा ; — आत्मविजयी, जितेन्द्रिय ; — समस्त भूतों का आत्म-स्वरूप बना ; — कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता

योगयुक्त, विशुद्ध आत्मा वाला, आत्मविजयी, जितेन्द्रिय, और समस्त भूतों का आत्म-स्वरूप बना हुआ पुरुष कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।