संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥
५-६ ॥
saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ |
yogayukto munirbrahma na cireṇādhigacchati ||
5-6 ||
किन्तु हे महाबाहु, योग के बिना संन्यास को प्राप्त करना कठिन है; योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।