Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.6 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.6

5.6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥ ५-६ ॥
saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ | yogayukto munirbrahma na cireṇādhigacchati || 5-6 ||
— किन्तु संन्यास, हे महाबाहु ; — योग के बिना प्राप्त करना कठिन ; — योगयुक्त मुनि ब्रह्म को ; — शीघ्र ही प्राप्त करता है

किन्तु हे महाबाहु, योग के बिना संन्यास को प्राप्त करना कठिन है; योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।