Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.15 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.15

5.15
नादत्ते कस्यचित् पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ ५-१५ ॥
nādatte kasyacit pāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ | ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ || 5-15 ||
— किसी का पाप ग्रहण नहीं करता ; — न पुण्य, विभु (आत्मा) ; — ज्ञान अज्ञान से ढका है ; — उससे प्राणी मोहित होते हैं

विभु (आत्मा) न किसी का पाप ग्रहण करता है, न पुण्य; ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, उसी से प्राणी मोहित होते हैं।