Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.8 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.8

4.8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ४-८ ॥
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām | dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge || 4-8 ||
— साधुओं की रक्षा के लिए ; — और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए ; — धर्म की स्थापना के लिए ; — युग-युग में प्रकट होता हूँ

साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए, और धर्म की भली-भाँति स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।