Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.7 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.7

4.7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मांशं सृजाम्यहम् ॥ ४-७ ॥
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata | abhyutthānamadharmasya tadātmāṃśaṃ sṛjāmyaham || 4-7 ||
— जब-जब धर्म की ; — हानि होती है, हे भारत ; — और अधर्म का उत्थान ; — तब मैं अपने अंश को प्रकट करता हूँ

हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने अंश को प्रकट करता हूँ।