Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.6 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.6

4.6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ४-६ ॥
ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san | prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya sambhavāmyātmamāyayā || 4-6 ||
— अज और अव्यय-स्वरूप होते हुए भी ; — भूतों का ईश्वर होते हुए भी ; — अपनी प्रकृति को अधिष्ठित करके ; — अपनी माया से प्रकट होता हूँ

यद्यपि मैं अज और अव्यय-स्वरूप हूँ, और भूतों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठित करके अपनी माया से प्रकट होता हूँ।