अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
४-३६ ॥
api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ |
sarvaṃ jñānaplavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi ||
4-36 ||
और यदि तू समस्त पापियों में भी अत्यन्त पापी हो, तो भी ज्ञान-रूपी नौका से ही समस्त पाप को भली-भाँति पार कर जाएगा।