Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.35 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.35

4.35
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ४-३५ ॥
yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava | yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi || 4-35 ||
— जिसे जानकर फिर मोह को ; — इस प्रकार तू नहीं पाएगा, हे पाण्डव ; — जिससे समस्त भूतों को बिना अपवाद ; — तू आत्मा में और मुझमें देखेगा

हे पाण्डव, जिसे जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिससे तू समस्त भूतों को बिना किसी अपवाद के आत्मा में, और फिर मुझमें देखेगा।