यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
४-३५ ॥
yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava |
yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi ||
4-35 ||
हे पाण्डव, जिसे जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिससे तू समस्त भूतों को बिना किसी अपवाद के आत्मा में, और फिर मुझमें देखेगा।