Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.10 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.10

3.10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ ३-१० ॥
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ | anena prasaviṣyadhvameṣa vo'stviṣṭakāmadhuk || 3-10 ||
— यज्ञ-सहित प्रजा की रचना करके ; — पूर्वकाल में प्रजापति ने कहा ; — इस यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त हो ; — यह तुम्हारी इष्ट कामनाओं की कामधेनु हो

पूर्वकाल में प्रजापति ने यज्ञ-सहित प्रजा की रचना करके कहा — इस यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त हो; यह तुम्हारी इष्ट कामनाओं को देने वाली कामधेनु हो।