Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.9 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.9

3.9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ३-९ ॥
yajñārthātkarmaṇo'nyatra loko'yaṃ karmabandhanaḥ | tadarthaṃ karma kaunteya muktasaṅgaḥ samācara || 3-9 ||
— यज्ञ के लिए किए कर्म के अतिरिक्त ; — यह लोक कर्म से बँधा है ; — उस (यज्ञ) के लिए कर्म कर, हे कुन्तीपुत्र ; — आसक्ति से मुक्त होकर आचरण कर

यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त, यह लोक कर्म से बँधा हुआ है; अतः हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति से मुक्त होकर उस (यज्ञ) के लिए कर्म करो।