देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
३-११ ॥
devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ |
parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||
3-11 ||
इस यज्ञ से तुम देवताओं को पुष्ट करो और वे देवता तुम्हें पुष्ट करें; इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे।