Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.74 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.74

2.74
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ २-७४ ॥
eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati | sthitvāsyāmantakāle'pi brahmanirvāṇamṛcchati || 2-74 ||
— यह ब्राह्मी स्थिति है, हे पार्थ ; — इसे प्राप्त करके मोहित नहीं होता ; — अन्तकाल में भी इसमें स्थित रहकर ; — ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है

हे पार्थ, यह ब्राह्मी स्थिति है; इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता; अन्तकाल में भी इसमें स्थित रहकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है।