Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.45 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.45

2.45
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ २-४५ ॥
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate || 2-45 ||
— भोग और ऐश्वर्य में आसक्तों की ; — उस वाणी से अपहृत चित्त वालों की ; — निश्चयात्मिका बुद्धि ; — समाधि में स्थिर नहीं होती

भोग और ऐश्वर्य में आसक्त, उस वाणी से अपहृत चित्त वाले मनुष्यों की निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।