Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.45
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
२-४५ ॥
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||
2-45 ||
— भोग और ऐश्वर्य में आसक्तों की ; — उस वाणी से अपहृत चित्त वालों की ; — निश्चयात्मिका बुद्धि ; — समाधि में स्थिर नहीं होती भोग और ऐश्वर्य में आसक्त, उस वाणी से अपहृत चित्त वाले मनुष्यों की निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।