वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
२-२३ ॥
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi |
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā- nyanyāni saṃyāti navāni dehī ||
2-23 ||
जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही देही (आत्मा) जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों में प्रवेश करता है।