Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.23 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.23

2.23
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २-२३ ॥
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā- nyanyāni saṃyāti navāni dehī || 2-23 ||
— जैसे जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर ; — मनुष्य दूसरे नए ग्रहण करता है ; — वैसे ही जीर्ण शरीरों को त्यागकर ; — देही दूसरे नए (शरीरों) में प्रवेश करता है

जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही देही (आत्मा) जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों में प्रवेश करता है।