Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.22
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ हन्यते हन्ति वा कथम् ॥
२-२२ ॥
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha hanyate hanti vā katham ||
2-22 ||
— इसे अविनाशी, नित्य जानता है ; — जो इसे अज, अव्यय (जानता है) ; — हे पार्थ, वह पुरुष कैसे ; — किसे मारता है अथवा किसे मरवाता है हे पार्थ, जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसे मारता है अथवा किसे मरवाता है?