Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.22 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.22

2.22
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ हन्यते हन्ति वा कथम् ॥ २-२२ ॥
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enamajamavyayam | kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha hanyate hanti vā katham || 2-22 ||
— इसे अविनाशी, नित्य जानता है ; — जो इसे अज, अव्यय (जानता है) ; — हे पार्थ, वह पुरुष कैसे ; — किसे मारता है अथवा किसे मरवाता है

हे पार्थ, जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय जानता है, वह पुरुष किसे मारता है अथवा किसे मरवाता है?