Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.20 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.20

2.20
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ २-२० ॥
ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate || 2-20 ||
— जो इसे मारने वाला समझता है ; — और जो इसे मरा हुआ मानता है ; — वे दोनों नहीं जानते ; — यह न मारता है, न मारा जाता है

जो इस (आत्मा) को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों नहीं जानते; यह न मारता है, न मारा जाता है।