Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.40 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.40

18.40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ १८-४० ॥
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ | sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ || 18-40 ||
— न पृथ्वी पर ऐसा है ; — न फिर स्वर्ग में देवताओं में ; — ऐसा सत्त्व (प्राणी) जो प्रकृति से उत्पन्न से मुक्त हो ; — जो इन तीनों गुणों से (मुक्त) हो

न पृथ्वी पर और न फिर स्वर्ग में देवताओं में ही ऐसा कोई सत्त्व (प्राणी) है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।