न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
१८-४० ॥
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ |
sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ ||
18-40 ||
न पृथ्वी पर और न फिर स्वर्ग में देवताओं में ही ऐसा कोई सत्त्व (प्राणी) है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।