Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.39 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.39

18.39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १८-३९ ॥
yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ | nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam || 18-39 ||
— जो आरम्भ में और परिणाम में भी ; — आत्मा को मोहित करने वाला सुख ; — निद्रा, आलस्य, प्रमाद से उत्पन्न ; — वह तामस कहा गया

जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, और निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न है — वह तामस कहा गया है।