Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.15 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.15

17.15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १७-१५ ॥
anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat | svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate || 17-15 ||
— उद्वेग न करने वाला वचन ; — सत्य, प्रिय और हितकारी जो ; — और स्वाध्याय का अभ्यास ; — वाणी का तप कहलाता है

उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी वचन, तथा स्वाध्याय का अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।