Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.14 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.14

17.14
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १७-१४ ॥
devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucamārjavam | brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate || 17-14 ||
— देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञ का पूजन ; — शौच, सरलता ; — ब्रह्मचर्य और अहिंसा ; — शरीर का तप कहलाता है

देव, द्विज, गुरु और प्राज्ञ का पूजन; शौच, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहलाता है।