Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.13 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.13

17.13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १७-१३ ॥
vidhihīnamasṛṣṭānnaṃ mantrahīnamadakṣiṇam | śraddhāvirahitaṃ yajñaṃ tāmasaṃ paricakṣate || 17-13 ||
— विधिहीन, अन्न के वितरण से रहित ; — मन्त्रहीन, दक्षिणा-रहित ; — श्रद्धा-विहीन यज्ञ को ; — तामस कहते हैं

विधिहीन, अन्न के वितरण से रहित, मन्त्रहीन, दक्षिणा-रहित और श्रद्धा-विहीन यज्ञ को तामस कहते हैं।