Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.16 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.16

17.16
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १७-१६ ॥
manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ maunamātmavinigrahaḥ | bhāvasaṃśuddhirityetattapo mānasamucyate || 17-16 ||
— मन की प्रसन्नता, सौम्यता ; — मौन, आत्म-निग्रह ; — भाव की शुद्धि — यह ; — मानसिक तप कहलाता है

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-निग्रह और भाव की शुद्धि — यह मानसिक तप कहलाता है।